आत्मिक युद्ध कैसे जीतें और शैतान को कैसे हराएँ
जब विचार एक के बाद एक आकर आपको दोष, डर और दोषसिद्धि में डालने लगें — तब लड़ाई मन में चल रही होती है। यह लेख बताता है कि उस लड़ाई में खड़े कैसे होना है।
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क्या आपने कभी ऐसा अनुभव किया है कि अचानक आपके मन में एक के बाद एक ऐसे विचार आने लगें, जो आपको दोष (guilt), डर (fear), दोषसिद्धि (condemnation) और परमेश्वर से दूरी महसूस कराने लगें?
आपने जो किया, उसमें भी आपको ग़लती दिखाई देने लगे। और जो नहीं किया, उसमें भी दोष महसूस होने लगे। हर परिस्थिति में आपको अपनी कमी और अपनी ग़लती ही नज़र आने लगे। कई बार कोई बात असल में ग़लत भी नहीं होती, फिर भी मन में एक दबाव बनने लगता है कि “यह ग़लत है” — और वही दबाव आपको तनाव और घबराहट तक ले जाता है।
- “शायद मैंने परमेश्वर को निराश कर दिया है।”
- “शायद मैं अच्छा मसीही नहीं हूँ।”
फिर आप सही काम करते हैं, लेकिन उसके बाद भी शैतान आपसे कहता है — “यह काफ़ी नहीं है।” “तुमने इसे सही तरीक़े से नहीं किया।” और आप धीरे-धीरे उसी दबाव, तनाव और घबराहट में उतरते चले जाते हैं।
1. पहले पहचानिए — यह विचार किसकी ओर से है?
सबसे पहले हमें यह समझना ज़रूरी है कि जो विचार हमें परेशान कर रहे हैं, वे परमेश्वर की ओर से हैं या शैतान की ओर से। क्योंकि जब तक आप यह नहीं जानते कि आवाज़ किसकी है, तब तक आप उसका विरोध कैसे करेंगे? जिस विचार को आप परमेश्वर की आवाज़ समझ लेते हैं, उसके सामने आप हथियार डाल देते हैं।
बाइबल साफ़ बताती है:
क्योंकि परमेश्वर गड़बड़ी का नहीं, परन्तु शान्ति का परमेश्वर है। जैसा पवित्र लोगों की सब कलीसियाओं में है।जो अनुवाद “गड़बड़ी” कहता है, वही बात अंग्रेज़ी में confusion है — यानी उलझन। इसलिए अगर कोई बात, कोई विचार आपको लगातार उलझन, तनाव और घबराहट में ले जा रहा है, तो वह परमेश्वर की ओर से नहीं है। परमेश्वर सुधारता है, पर उसका सुधार आपको उसकी ओर खींचता है — उससे दूर नहीं धकेलता। परमेश्वर अगर आपसे कुछ कहते हैं, तो शान्ति के साथ कहते हैं। जो विचार, जो आवाज़ परमेश्वर की तरफ़ से होती है, उससे शान्ति ही आती है।
आपको उन विचारों पर अधिकार दिया गया है
मुझे परमेश्वर ने यह सिखाया — जो विचार आपको परेशान कर रहा है, तनाव और घबराहट दे रहा है, चाहे वह आपको ऐसा लगे कि परमेश्वर की ओर से है, तो भी वह नहीं है; और आप उसे नाश कर सकते हैं। क्योंकि नए नियम में हमें शैतान पर और हर उस चीज़ पर अधिकार दिया गया है जो हमें परेशान करती है।
देखो, मैं ने तुम्हें साँपों और बिच्छुओं को रौंदने का, और शत्रु की सारी सामर्थ्य पर अधिकार दिया है; और किसी वस्तु से तुम्हें कुछ हानि न होगी।लेकिन कई बार विश्वासी नए नियम और पुराने नियम के बीच उलझ जाता है। लोग कहते हैं — “अय्यूब के साथ भी तो बुरा हुआ, परमेश्वर ने ही अनुमति दी थी।” लेकिन अगर परमेश्वर ही यह सब करता या करवाता, तो उसने विश्वासियों को अधिकार क्यों दिया? अय्यूब को यह अधिकार नहीं दिया गया था — वह पुराने नियम में था। हमें दिया गया है। हमें बीमारी, तनाव और घबराहट सहते रहने की ज़रूरत नहीं है, वरना परमेश्वर हमें अधिकार ही न देते।
2. पुराने नियम और नए नियम का अंतर
हम नए नियम में हैं, इसलिए हमें परमेश्वर को नई वाचा (New Covenant) की रोशनी में समझना है। पुराने नियम में दाऊद की गिनती का उदाहरण देखिए। एक जगह बाइबल कहती है कि परमेश्वर ने दाऊद को इस्राएल की गिनती लेने के लिए उभारा:
यहोवा का कोप इस्राएलियों पर फिर भड़का, और उसने दाऊद को उनकी हानि के लिये यह कहकर उभारा, “इस्राएल और यहूदा की गिनती ले।”लेकिन दूसरी जगह लिखा है:
शैतान ने इस्राएल के विरुद्ध उठकर, दाऊद को उकसाया कि इस्राएलियों की गिनती ले।यहाँ हम देख सकते हैं कि पुराने नियम की किसी परिस्थिति को समझने के लिए हमें नए नियम में मिले प्रकाशन (revelation) को भी समझना ज़रूरी है। नया नियम हमें बताता है कि उसके पीछे असल में कौन था।
यीशु में पिता को जानना
मेरे पिता ने मुझे सब कुछ सौंपा है; और कोई पुत्र को नहीं जानता, केवल पिता; और कोई पिता को नहीं जानता, केवल पुत्र; और वह जिस पर पुत्र उसे प्रगट करना चाहे।यानी पिता परमेश्वर को जानने का सबसे स्पष्ट प्रकाशन यीशु मसीह के द्वारा आता है। हमें पुराने नियम को नकारना नहीं है। हमें पुराना नियम पढ़ना है और उसमें यीशु को देखना है — क्योंकि बाइबल कहती है कि पुराना नियम आनेवाली अच्छी चीज़ों का प्रतिबिम्ब, यानी उनकी छाया था — असली स्वरूप नहीं।
क्योंकि व्यवस्था, जिसमें आनेवाली अच्छी वस्तुओं का प्रतिबिम्ब है पर उनका असली स्वरूप नहीं…और परमेश्वर की परिपूर्णता यीशु में है — पौलुस मसीह के बारे में लिखता है:
क्योंकि उसमें ईश्वरत्व की सारी परिपूर्णता सदेह वास करती है,यीशु ने क्या किया?
यीशु ने सब लोगों को चंगा किया। उन्होंने किसी को बीमार नहीं किया — तो परमेश्वर भी किसी को बीमार नहीं करता। इसलिए हमें यीशु के कामों को देखकर परमेश्वर के स्वभाव को समझना चाहिए, अपनी परिस्थितियों को देखकर नहीं।
3. शैतान से अपनी आज्ञाकारिता के बल पर मत लड़िए
यहाँ मैं यह नहीं कह रहा कि हमें आज्ञाकारिता नहीं करनी। हमें परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना है, क्योंकि आज्ञाकारिता हमें परमेश्वर के करीब ले जाती है। लेकिन हम शैतान को अपनी आज्ञाकारिता के बल पर नहीं हरा सकते।
क्योंकि शैतान एक माहिर धोखेबाज़ (master deceiver) है। आप कहीं न कहीं ग़लती करेंगे ही। और अगर आप सिर्फ़ अपनी ग़लतियों पर ध्यान देने लगें, तो शैतान को आपकी ज़िंदगी में काम करने का मौक़ा मिल जाता है। वह आपसे बार-बार कहेगा:
- “तुमने यह ग़लत किया।”
- “तुमने वह सही नहीं किया।”
- “तुमने परमेश्वर की आज्ञा ठीक से नहीं मानी।”
आप एक ग़लती ठीक करेंगे, तो वह दूसरी दिखा देगा। फिर तीसरी। फिर चौथी। और यह चक्र कभी ख़त्म नहीं होगा। शैतान को परमेश्वर का वचन आपसे ज़्यादा पता है — लेकिन उसे हराने का तरीक़ा अपनी परिपूर्णता साबित करना नहीं है। उसका सामना करना है।
4. हमारी धार्मिकता यीशु की है
हम शैतान से अपनी धार्मिकता के साथ नहीं लड़ते। हमारे पास यीशु की धार्मिकता है। यीशु की आज्ञाकारिता की वजह से हम धर्मी हैं, न कि अपनी आज्ञाकारिता की वजह से। आपसे ग़लती हो सकती है, फिर भी आप धर्मी हैं — क्योंकि आपकी धार्मिकता आपकी अपनी परिपूर्णता से नहीं, यीशु मसीह से है।
जो पाप से अज्ञात था, उसी को उसने हमारे लिये पाप ठहराया कि हम उसमें होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ।क्योंकि जैसा एक मनुष्य के आज्ञा न मानने से बहुत लोग पापी ठहरे, वैसे ही एक मनुष्य के आज्ञा मानने से बहुत लोग धर्मी ठहरेंगे।इसलिए जब शैतान आपको आपकी ग़लतियों के ज़रिए दोषी ठहराए, तो अपनी धार्मिकता को अपने प्रदर्शन (performance) में मत ढूँढिए। आपकी धार्मिकता यीशु में है — और वह किसी दिन अच्छे प्रदर्शन पर बढ़ती नहीं, न बुरे दिन पर घटती है।
5. परमेश्वर के अधीन हो जाओ, और शैतान का सामना करो
अब जब हमें पता है कि शैतान हमारे विरुद्ध आ सकता है, तो सवाल यह है — हम उसका विरोध कैसे करें? बाइबल कहती है:
इसलिये परमेश्वर के अधीन हो जाओ; और शैतान का सामना करो, तो वह तुम्हारे पास से भाग निकलेगा।अगर शैतान आपके विरुद्ध आए — आपको डर के विचार दे, दोष और दोषसिद्धि के विचार दे, या बीमारी लेकर आए — तो यह मत सोचिए कि “कहीं मैंने कोई ग़लती तो नहीं कर दी”, या “परमेश्वर ने किसी कारण से इसे होने दिया है”। नहीं। उसी समय विश्वास में खड़े हो जाइए। कमरा बंद कीजिए और पूरी शक्ति के साथ शैतान पर हमला कीजिए। अगर आपको अन्य भाषा मिली हुई है तो अन्य भाषा में प्रार्थना कीजिए; नहीं मिली है तो वचन बोलिए। उसका सामना कीजिए — वह भाग जाएगा।
मेरी गवाही
एक दिन मेरे साथ ऐसा हुआ कि मेरा मन दोष और दोषसिद्धि के विचारों से भर गया। हर चीज़ में मुझे अपनी ग़लती दिखाई देने लगी। हर परिस्थिति का नकारात्मक पहलू सामने आने लगा। जो बात सामान्य थी, उसमें भी मुझे पाप नज़र आने लगा।
लेकिन उस वक़्त मैंने एक फ़ैसला किया: “मैं इन विचारों को चुपचाप स्वीकार नहीं करूँगा।” मैंने अपना कमरा बंद किया और लगभग एक घंटे तक उन विचारों का विरोध किया। मैंने शैतान को डाँटा और उन विचारों को अपने पैरों तले रौंदने की तरह, अपनी पूरी सामर्थ्य के साथ उनका विरोध किया।
मैंने उस समय यह नहीं सोचा कि ये विचार परमेश्वर की तरफ़ से हैं या शैतान की तरफ़ से — कहीं परमेश्वर मुझे कुछ सिखा तो नहीं रहे। मैंने उस समय हर उस विचार को रौंद दिया जो मुझे परेशान कर रहा था, जो मुझे तनाव और घबराहट दे रहा था। उन विचारों के साथ मैंने कोई समझौता नहीं किया। परमेश्वर ने मुझे यही सिखाया है — जो तुम्हारे विरोध में आए, तुम उसका नाश कर दो। देखो, मैं ने तुम्हें साँपों और बिच्छुओं को रौंदने का, और शत्रु की सारी सामर्थ्य पर अधिकार दिया है; और किसी वस्तु से तुम्हें कुछ हानि न होगी।लूका 10:19 · HIOV हिंदीबाइबल में पढ़िएमैं तुझे स्वर्ग के राज्य की कुंजियाँ दूँगा: और जो कुछ तू पृथ्वी पर बाँधेगा, वह स्वर्ग में बंधेगा; और जो कुछ तू पृथ्वी पर खोलेगा, वह स्वर्ग में खुलेगा।”मत्ती 16:19 · HIOV हिंदीबाइबल में पढ़िए
कभी-कभी शैतान आपके मन में इतना नियंत्रण जमा लेता है कि आपको उसके विरुद्ध पूरी गंभीरता और विश्वास के साथ खड़ा होना पड़ता है। मैंने उन विचारों को ऐसे देखा जैसे मेरे सामने साँप और बिच्छू हों — और मैं उन्हें अपने ऊपर अधिकार नहीं दे रहा, बल्कि उन्हें रौंद रहा हूँ। और मैंने यह एक घंटे तक किया।
उस दिन मुझे विश्वास हुआ कि मैं इन विचारों से आज़ाद हो गया हूँ। धीरे-धीरे वे विचार ख़त्म होने लगे। उन विचारों के दबाव की वजह से मुझे सीने में दर्द भी हुआ था, लेकिन वह दर्द भी धीरे-धीरे कम होने लगा और अगले दिन बिल्कुल ख़त्म हो गया। और मैं आज़ाद हो गया।